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आलक शरवसतव क व चनद कवतए जनक आकरषण कभ फक नह पडत

लेखक-पत्रकार-अनुवादक और कवि आलोक श्रीवास्तव के कविता-संग्रह 'दिखना तुम सांझ-तारे को' की कविताओं के बारे में बात करते हुए, उनके ही लिखे शब्दों को उठाना ज़रूरी हो जाता है. इस कविता-संग्रह में कवि उस लड़की के बारे में बात करते हैं, 'जो जंगली फूलों के रहस्य जानती थी, परियों से बातें करती थी और कभी-कभी खुद परी बन जाती थी. एक ऐसी लड़की जिसे वसंत विभोर कर देता है और अपने शहर के खंडहर उसे अपने पास बुलाते हैं.' संग्रह की कविताएं एक अलग तरह की दुनिया में ले जाती हैं, एक ऐसी दुनिया में जहां इस दुनिया और इस दुनिया से पहले की दुनिया की तमाम लड़कियों की कल्पनाएं उस लड़की की आखों में दिखाई पड़ती हैं. कविताओं को पढ़ते हुए आप गहराई से ये महसूस कर पाते हैं, कि आलोक ने ढेर सारी सरलताओं को इकट्ठा करके कविता-संग्रह में एक ऐसी लड़की को रचा है, जिसका मन सदियों पुरानी किसी नदी की ओर लौटने को तड़प उठता है. कविताओं की भाषा इतनी सरल, सहज और आकर्षक है, कि कवि की सहजता का अंदाजा लगाया जा सकता है. क्या सचमुच कविता इतनी खूबसूरत हो सकती है, जो स्वप्न बनकर दरवाज़े पर दस्तक दे? क्या सचमुच प्रेम को इस तरह जिया और महसूस किया जा सकता है? क्या सचमुच कोई स्त्री के मन को इतनी शिद्दत से पढ़ पाता है…? ऐसे कई सवालों के जवाब जानने के लिए, आइए पढ़ते हैं इस कविता संग्रह से कुछ चुनिंदा कविताएं, जिनका होना कितना ज़रूरी है, ये उन्हें पढ़ने के बाद पता चलता है…

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