9 फरवरी 1940 में जन्मे विष्णु खरे ने न सिर्फ कविताएं लिखीं, बल्कि अपने बाद में आने वाले कवियों की कई पीढ़ियों को भी प्रभावित किया है. उनकी तुलना यदि किसी से की जा सकती है, तो वे अकेले मुक्तिबोध ही हैं. जिस तरह मुक्तिबोध ने सच, ईमानदारी और मौलिकता को अपनी रचनाओं में बनाए रखा, उसी तरह विष्णु खरे ने भी उस विरासत को बचाए रखा. गौरतलब है कि विष्ण खरे अपनी मौलिक किस्म की टिप्पणियों के लिए ख़ास तौर पर जाने गए. उन्होंने जितना काम किया और जिन-जिन विधाओं में किया, उसे देखकर विस्मय में पड़ जाना सामान्य बात है. कबीर, निराला और मुक्तिबोध के बाद यदि उन्हें हिंदी के आखिरी मूर्तिभंजक के रूप में गिना जाए तो अतिश्योक्ति न होगी. अपने जीवंत शब्दों के साथ वे हिंदी साहित्य की दुनिया को अपने बाद भी प्रकाशित कर रहे हैं.
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