नरेश मेहता अपनी प्रयोगधर्मिता के लिए हिंदी साहित्य में अलग स्थान रखते हैं. उन्होंने बहुत सारी रचनाएं कीं. उनकी रचनाओं के बाद हिंदी साहित्य में एक अलग धारा भी निकल पड़ी थी. बहसे भी खूब हुईं. तमाम बहसों के बीच नरेश मेहता की रचनाधर्मिता चलती रही और हिंदी साहित्य समृद्ध होता रहा. 1962 के युद्ध के दौरान उन्होंने राम को प्रतीक बना कर 'संशय की रात' नामक रचना के जरिए युद्ध और उसकी विभिषिका, युद्ध और उसके उद्देश्य, लोकतांत्रिक निर्णय की सर्वोच्चता जैसे विषयों पर बहुत ही सार्थक चिंतन हिंदी को सौंपा. हिंदी साहित्य में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा.
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